जीवन यात्रा के संवेदनशील क्षणो के साझी पल
वक़्त के पार जब देखा खुद को
न शोर था, न कोई भीड़,
सिर्फ़ यादों की मौन परछाइयाँ थीं,
जो कह रही थीं—
तुम अब भी वही हो,
बस अनुभव का रंग गहरा हो गया है।
“संस्पर्श” की नमी आज भी आँखों में है,
शब्दों ने जो न छुआ, वो भाव आज बोलते हैं।
“संदर्श” की दृष्टि अब और दूर तक जाती है,
जहाँ शब्द कम और मौन अधिक कहते हैं।