आज की कविता

फिर से आरम्भ

जो बीत गया,
उसे सम्मान के साथ विदा करता हूँ।
उसने मुझे अनुभव दिए,
कुछ मुस्कानें,
कुछ सीखें,
और समय की अनमोल समझ।

अब मैं पीछे नहीं देखता,
न किसी शिकायत के साथ,
न किसी पश्चाताप के साथ।
जो था, वह अपनी जगह पूर्ण था,
जो है, वही मेरा सत्य है।

मैं नए प्रभात की ओर बढ़ रहा हूँ,
मन में विश्वास लिए,
हृदय में शांति लिए,
और आँखों में नए स्वप्न लिए।

न किसी से स्पर्धा,
न किसी से अपेक्षा,
केवल अपने पथ पर
सजग और दृढ़ कदम।

यदि राह में फूल मिलें,
तो कृतज्ञ रहूँगा;
यदि शूल मिलें,
तो धैर्य रखूँगा।
क्योंकि अब समझ लिया है—
हर मौसम का अपना महत्व होता है।

आज मैं स्वयं से एक वचन लेता हूँ—
जीवन की शेष यात्रा
सकारात्मकता, स्नेह और सृजन के साथ जीऊँगा।
जहाँ तक संभव होगा,
प्रकाश बाँटूँगा,
और जहाँ अंधेरा होगा,
वहाँ एक दीप अवश्य जलाऊँगा।

यह अंत नहीं,
एक नया अध्याय है।
एक नई कहानी,
जो आशा, आत्मविश्वास और संतुलन के शब्दों से लिखी जाएगी।

मैं तैयार हूँ—
मुस्कुराकर,
नम्रता के साथ,
पर अपने संकल्प में अडिग होकर।

और यही मेरा नया आरम्भ है।

नव वर्ष 2026

नववर्ष 2026

कैलेंडर बदला है,
पर समय अब भी
मन के दरवाज़े पर
धीमे से दस्तक देता है।

पीछे छूटी हुई थकान
आज बोझ नहीं,
अनुभव बनकर
कंधे से उतर रही है।

जो कहा नहीं गया
वह भी साथ चला आया,
और जो खो गया
उसने लौटना सिखा दिया।

यह नया वर्ष
बस इतना कहता है,
अब ठहराव में भी
आगे बढ़ना संभव है।

चलो,
इस बार तेज़ नहीं,
सच के साथ चलें,
जहाँ मौन भी
पूरा वाक्य हो।

“अरुण वीर सिंह “
1.1.2026 

नया सूरज
आपके लिए
शौर्य और यश की उजास लाए,
और चाँद
अपनी शीतलता
मन तक उतार दे।
नववर्ष की मंगलकामना ।

मौन की पदयात्रा

शब्द थक चुके थे,
और उत्तर खोखले लगने  लगे थे ।

तब भीतर कुछ बोला ---
नहीं,शायद.....वह मौन था ।

मैं चलता गया ----
न रास्ता तय था,न मंजिल …
बस एक आंतरिक पुकार थी ,
जो दिशा बनती गयी ।

वह यात्रा सरल नहीं थी --
हर पड़ाव पर मैं ख़ुद से मिला,
और हर बार....थोड़ा बदल गया ।

एक दिन जब कुछ न रहा कहने को,
तब पहली बार सुना ख़ुद को ।

मौन की पदचाप,
शब्दों से कहीं अधिक सच्ची थी ।

अब जान गया हूँ -----
यात्रा वह नहीं जो चलकर तय हो,
यात्रा वह है जो मौन में खुलती है,
भीतर...धीमे.....स्थिर ....धीरे.....धीरे ।